यह घटना मुंगेर सदर अस्पताल में मरीजों के लिए एक बड़ी परेशानी का कारण बन गई। जब मरीज अपनी बीमारियों का इलाज कराने अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें यह उम्मीद थी कि डॉक्टर उनकी समस्याओं को सुनेंगे और उचित इलाज प्रदान करेंगे। लेकिन हुआ इसके बिल्कुल विपरीत। ओपीडी में डॉक्टर पहले तो मरीजों को देखने बैठे, लेकिन अचानक सभी डॉक्टरों ने मरीजों को देखना बंद कर दिया और वहां से उठकर चले गए। यही नहीं, अस्पताल में पर्ची काटने का काम भी रोक दिया गया, जिससे मरीजों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।
मरीजों का कहना था कि अगर डॉक्टरों को हड़ताल पर जाना ही था तो पहले से सूचना दी जानी चाहिए थी, जिससे वे बेवजह अस्पताल न आते। कई मरीज दूर-दराज के इलाकों से बड़ी उम्मीद लेकर अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन वहां पहुंचकर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। कुछ मरीजों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि अगर डॉक्टरों ने पहले से ही ओपीडी सेवा बंद रखने का निर्णय लिया था, तो फिर चिट्ठा काटने की क्या जरूरत थी? इससे उन्हें न सिर्फ समय की बर्बादी हुई बल्कि आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा। कई मरीज ऐसे थे जो सुबह जल्दी निकलकर अस्पताल पहुंचे थे, लेकिन वहां पहुंचने के बाद पता चला कि डॉक्टरों ने मरीजों को देखना बंद कर दिया है।
डॉक्टरों की यह हड़ताल बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ (BHSA) के आह्वान पर की गई थी। संघ का कहना है कि वे बायोमेट्रिक अटेंडेंस, प्रशासनिक उत्पीड़न और अस्पतालों में कर्मचारियों की कमी को लेकर नाराज हैं। इसी के विरोध में तीन दिनों तक ओपीडी सेवा बाधित करने का फैसला लिया गया है। डॉक्टरों का कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक वे इस तरह से अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।
इससे पहले आज सुबह जब मुंगेर सदर अस्पताल में मरीजों का आना शुरू हुआ, तो डॉक्टर अपने चैंबर में बैठकर मरीजों को देख रहे थे। मरीजों की पर्चियां भी कट रही थीं, जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ओपीडी सेवा सामान्य रूप से चल रही है। लेकिन करीब एक घंटे बाद सभी डॉक्टरों ने अचानक मरीजों को देखना बंद कर दिया और वहां से चले गए। इसके बाद अस्पताल प्रशासन ने ओपीडी काउंटर को भी बंद कर दिया, जिससे मरीजों की परेशानी और बढ़ गई।
अस्पताल में आए कई मरीजों ने इस अव्यवस्था को लेकर नाराजगी जाहिर की। एक मरीज ने कहा कि वह सुबह से भूखा-प्यासा रहकर अस्पताल आया था, लेकिन डॉक्टरों ने बिना किसी पूर्व सूचना के मरीजों को देखना बंद कर दिया। इसी तरह, एक अन्य मरीज, जो अपने छोटे बच्चे का इलाज कराने आया था, ने बताया कि उसे काफी उम्मीद थी कि डॉक्टर उसका सही इलाज करेंगे, लेकिन जब उसे पता चला कि ओपीडी सेवा बंद कर दी गई है, तो वह मायूस हो गया।
डॉक्टरों की इस हड़ताल का असर इमरजेंसी वार्ड पर भी देखने को मिला। ओपीडी बंद होने के कारण मरीजों को मजबूरी में इमरजेंसी वार्ड की ओर रुख करना पड़ा। इससे वहां मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई, जिससे आपाधापी की स्थिति बन गई। इमरजेंसी वार्ड के डॉक्टरों और स्टाफ पर भी अतिरिक्त दबाव आ गया। मरीजों के बीच जल्द से जल्द दिखाने की होड़ मच गई, जिससे अस्पताल के हालात और बिगड़ने लगे।
इस बीच, कुछ मरीजों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि प्रशासन को इस स्थिति का समाधान निकालना चाहिए। मरीजों का कहना है कि हड़ताल करना डॉक्टरों का अधिकार हो सकता है, लेकिन मरीजों को यूं परेशान करना सही नहीं है। कुछ मरीजों ने सरकार से मांग की कि अस्पतालों में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए और डॉक्टरों की समस्याओं का समाधान निकाला जाए, ताकि भविष्य में मरीजों को इस तरह की परेशानी न उठानी पड़े।
वहीं, कुछ मरीजों ने यह भी बताया कि आयुष चिकित्सक कुछ समय तक मरीजों को देख रहे थे, लेकिन बाद में उन्हें भी ओपीडी बंद करने का निर्देश दे दिया गया। उन्होंने भी डॉक्टरों के आंदोलन का समर्थन किया और मरीजों को देखना बंद कर दिया। इससे अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल बन गया और मरीजों को समझ नहीं आ रहा था कि वे क्या करें।
अस्पताल के बाहर भी मरीजों और उनके परिजनों में नाराजगी देखी गई। कुछ लोगों ने सरकार और प्रशासन से इस हड़ताल को जल्द से जल्द खत्म कराने की अपील की, ताकि मरीजों को बेवजह की परेशानियों का सामना न करना पड़े। मरीजों का कहना था कि सरकार को डॉक्टरों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने और मरीजों को समय पर इलाज मिल सके।